एमएसपी (MSP) क्या होता है- MSP Full Form In Hindi , MSP से लाभ

नमस्कार दोस्तों आज हम MSP (Minimum Support Price) के बारे में बात करेंगे और जानेंगे कि आखिरकार MSP Kya Hai , MSP Full Form , Apmc Full Form , न्यूनतम समर्थन मूल्य का उद्देश्य क्या है , Minimum Support Price कैसे तय की जाती है , और इससे जुड़ी संपूर्ण जानकारी तो अंत तक इस लेख को पढ़ें चलिए शुरू करते हैं.|

MSP का Full Form और यह है क्या.?

MSP का फुल फॉर्म Minimum Support Price अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है| भारत सरकार द्वारा उत्पादक किसानों को नई फसल के दौरान कीमतों में अत्यधिक गिरावट से बचाने के लिए एक निर्धारित मूल्य है|

भारत में किसानों को होने वाली बाजार की अनिश्चिताओं जैसे बाजार का रेट गिरना या उठना इसके साथ-साथ जो प्राकृतिक दुर्घटना होती हैं सूखा, तूफान आदि की अनिश्चिताओं से बचाने के तरीकों के रूप में भी जाना जाता है।

MSP हमारे किसानों के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि जो मूलधन किसानों को खेती करने में लगा है उससे अधिक कीमत उन्हें मिल सके और इस बात को वह सुनिश्चित भी करता है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का उद्देश्य क्या है ?

प्रमुख उद्देश्य है कि किसानों को होने वाली हानि से बचाना तथा उनके संपूर्ण खाद्यान्न की बिक्री में समर्थन प्रदान करना और सार्वजनिक वितरण के लिए किसानों से खाद्यान्न को खरीदना।

CACP का Full Form और यह क्या है?

CACP अर्थात कृषि लागत और मूल्य आयोग अर्थात सीएसीपी द्वारा किए गए सिफारिश पर भारत सरकार किसानों की फसल पर MSP तय करती है और जो भारत सरकार द्वारा MSP तय होती है वह किसानों के फसलों पर लागू होती है और यह MSP 26 फसलों में लागू होती है जैसे कि अनाज दलहन तिलहन सोया अन्य और फसलें इन 26 फसल में शामिल है।

यदि MSP को समझने के लिए देखा जाए तो हम कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं मान लीजिए भारत सरकार द्वारा किसानों की 2022 की गेहूं की फसल को 2500 प्रति क्विंटल के हिसाब से MSP तय किया गया है तो अब भारत सरकार का कहना है कि हमारे द्वारा जो MSP तय कर दी गई है उस पर सरकारी मंडी किसानों से 2500 प्रति कुंटल मूल से कम खरीदी नहीं कर सकता भारत सरकार यह सब ध्यान में रखकर एमएसपी तैयार करती है जिससे कि किसानों को बिल्कुल भी हानि ना हो लेकिन सरकार द्वारा इतना कुछ करने के बावजूद कई किसान तो MSP के बारे में जानते भी नहीं है फायदा तो दूर की बात।

लेकिन कुछ किसान जो इसका फायदा उठा रहे हैं आज उनकी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार हुआ है लेकिन और दुख की बात तो यह है कि आज भी कई किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है इस स्कीम में सरकार काम कर रही है जिसमें हमारे सभी किसान भाइयों को इसका (MSP) का ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके |

MSP तय करने के साथ-साथ भारत सरकार यह भी सुनिश्चित करता है की सभी किसानों की फसल सरकार द्वारा तय की गई MSP में खरीदी जा सके इसके लिए भारत सरकार ने अपनी संस्था FCI ने जिला तथा ब्लॉक लेवल में काफी सारे गोदाम बनाए हुए हैं जिस पर सरकारी मंडी वाले जाकर MSP पर खरीद सकते हैं और उन्हें जनता तक पहुंचा सकते हैं लेकिन सरकार इस फसल को अपनी जरूरत के हिसाब से जैसे गरीब लोगों पर चलाई जा रही खाद्य सुरक्षा योजना के तहत बीपीएल कार्ड, राशन कार्ड, इन सब के तहत सस्ते दामों पर लोगों को उपलब्ध कराती है या फिर इसे बेच देती है यह सरकार के ऊपर रहता है|

MSP का संपूर्ण इतिहास आखिरकार MSP शुरू कैसे और क्यों हुई.?

यह बात है जब बिहार में अकाल अर्थात सूखा पड़ गया था उस समय बिहार सरकार के पास जनता को खिलाने के लिए कुछ भी ना था और ना ही सरकार के पास FCI गोदाम जैसी सुविधाएं थी तब युद्ध के परिणाम स्वरुप भोजन की कमी पड़ गई थी और उस 1960 के दशक में भारत में 1966 से 1967 में हरित क्रांति के प्रमुख वर्षों के दौरान खाद्यान्न के लिए सरकार मूल्य नीति, कृषि नीति आदि जैसे रणनीतियों को लूटा गया था तब सरकार के पास ना ही कुछ स्टोर था और ना ही जनता को वितरण करने का कोई प्लान|

इस आपदाओं और महामारी से बचने के लिए कई सारी नीतियां बनाई गई और मीटिंग में पेश की गई लेकिन कुछ रणनीति के कारण विफल हो गई और कुछ स्वयं जिम्मेदार साबित हुई लेकिन सभी नीतियों का मुख्य लक्ष्य कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना, उच्च उपज वाली किस्म, बेहतर उपकरण और उर्वरक था, भूमि उत्पादकता को बढ़ाने के उद्देश्य मूल्य नीति समर्थन इसी का मुख्य हिस्सा है यह मूल नीति ने 1965 में (APC) कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की थी|

इस आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य, पूर्व निर्धारित कीमतों और रियायती दरों पर खाद्यान्न की आपूर्ति के लिए कई नीतियां बनाई है और इसका संपूर्ण वितरण पेश किया इन सब नीतियों को देखा गया और परखा गया इस निकाय को मार्च 1985 में मूल आयोग सीएसीपी और कृषि लागत ने एक व्यापक संदर्भ अर्थात एक नए तरीके के साथ पुनर्गठित किया गया था उस समय (CACP) जब एमएसपी का चयन हुआ तब एमएसपी को लागू करने में कई अन्य संस्थान भी शामिल हुए जिसमें राज्य स्त्री निकाय के साथ-साथ केंद्रीय संगठन भी शामिल था इसमें अन्य संस्थान जैसे खाद्य निगम (FCI) और राष्ट्रीय कृषि सहकारी विप्राण संघ(NAFED) भी शामिल है|

इस नीति को लागू करने में तथा परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप गेहूं और चावल जैसे अनाजों के उत्पादन में वृद्धि हुई तथा मूल नीतियों का कार्य पक्षपात पूर्ण था जिसके परिणाम स्वरूप विविधीकरण पर कम ध्यान दिया गया जिस से दालों और खाद्य तेलों जैसे उत्पादों में कमी होनी लगी अर्थात यह चावल और गेहूं जैसे उत्पादों में ध्यान दिया गया जिससे इसका गंभीर प्रभाव राज्य क्षेत्र में पड़ा क्योंकि वस्तु का उत्पाद किसान के अनुसार अलग-अलग राज्य क्षेत्रों में होता है जिसके अनुसार चुनिंदा राज्य क्षेत्र ही इस एमएसपी का लाभ उठा रहे थे और कुछ को ही इसका लाभ हुआ है फिर जैसे-जैसे समय बड़ा इससे किसानों को  जागरूक किया गया|

2013 का सांख्यिकी आंकड़ा और 2018 -19का आंकड़ा.,

अब बात करते हैं 2013 के सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों की, इसके अनुसार यदि देखा जाए तो भारत में कृषि परिवार में 100% किसानों में कुल 23% किसान ही इस एमएसपी के बारे में जानते हैं और इसका लाभ उठाते हैं साथ ही जागरूकता की बात की जाए तो राज्य के अनुसार 0 से 50% तक अलग होती है तथा MSP पर खरीदने वाली मंडी या एजेंसी के बारे में भी बहुत कम लोगों को पता है अर्थात कम लोग ही इससे जुड़े हुए हैं|

अब बात करते हैं 2018 से 2019 के आंकड़ों की इसके अनुसार टोटल जितना भी धान और गेहूं था उसमें से कुल धान का एक चौथाई भाग ही एमएसपी में बेचा गया और गेहूं 100% में से 20% ही एमएसपी पर बेचा गया था|

इस एमएसपी को पूरा 100 तक पहुंचाने में कई योजनाएं प्रयास कर रही हैं कई  दशकों पुरानी मूल्य समर्थन योजना (PSS) फिर एक 2015 में बनाई गई विकेंद्रीकृत खरीद योजना (DCP) और हाल ही में एक बनाई गई 2018 में छाता अभियान और इसके अलावा इसमें किसान आए संरक्षण योजना भी शामिल हैं इसका प्रमुख उद्देश्य लोगों को जागरूक करना जिससे यह एमएसपी के बारे में जाने और इसका लाभ उठा सकें तथा इस से जुड़ सकें|

इसके अलावा सरकार आशा के तहत एक प्रणाली शुरू की है जिसका नाम मूल्य कमी भुगतान (PDP) है इस प्रणाली के तहत सरकार उस सभी किसानों को आंशिक रूप से मुआवजा देगी जिन्होंने अपनी फसल को MSP से कम, बाजार मूल्य पर  बेचना पड़ा है उन्हें मुआवजा सरकार द्वारा दिया जाएगा| इससे सरकार को बड़ी बचत भी हो सकती है क्योंकि सरकार को ना ही उसे खरीदना पड़ेगा और ना ही भंडारण करना पड़ेगा, यह सब से वह बस सकेगी और इससे जो भी पैसा बचेगा उसे कुछ किसानों के मुआवजा में चला जाएगा और बाकी सरकार का प्रॉफिट होगा|

एमएसपी Minimum Support Price का निर्धारण

न्यूनतम समर्थन मूल्य की राशि और जो भी अन्य गैर मूल है इन सब के संबंध में सिफारिशें तैयार करने में आयोग एक विशेष वस्तुओं और वस्तुओं के समूह की अर्थव्यवस्था की संपूर्ण संरचना के अलावा कुछ अन्य निम्न कारकों को भी ध्यान में रखता है जैसे कि-

  • उत्पाद की कीमत|
  • कीमतों में बदलाव|
  • निवेश/निर्गम मूल्य समानता|
  • बाजार की कीमतों में फसना|
  • आपूर्ति और मांग|
  • उद्योग में लगी लागत तथा संरचना का प्रभाव|
  • उद्योग  में रहने की लागत पर प्रभाव|
  • अंतर फसल मूल समता|
  • सामान्य मूल्य स्तर पर प्रभाव|
  • उस उत्पाद की अंतरराष्ट्रीय मूल्य की स्थिति क्या है|
  • किसान द्वारा जो भी कीमत भुगतान की गई और जो कीमत प्राप्त की गई उन दोनों के बीच समानता|
  • आउटपुट कीमतों पर प्रभाव|
  • जो खर्च सब्सिडी पर आता है उस पर भी ध्यान देना|

आयोग राज्य, जिला, देश यह सब स्तर पर जांच कर छोटी सी छोटी सूक्ष्मा स्त्री तक की डाटा को और समुच्चय स्त्री तक की डाटा दोनों को उपयोग करता है तथा इस आयोग द्वारा उपयोग की जाने वाली तथा ध्यान में रखकर कार्य की जाने वाली सूचना या डाटा अन्य बात के साथ-साथ कुछ और बातें भी शामिल है  जो निम्नलिखित है

  • खेती जिस जगह में की जा रही उस जमीन का परिमाप अर्थात कितने हेक्टेयर की खेती है उस जमीन में खेती की लागत और अन्य देशों के क्षेत्रों में लागत की संरचना और परिवर्तन इसको भी  देखा जाता है।
  • देश के हर क्षेत्र क्षेत्रों की उत्पादकता तथा प्रति क्विंटल उत्पादक में लगी लागत और उस पर हुआ परिवर्तन को भी देखा जाता है।
  • अलग-अलग अनाजों की अलग-अलग कीमत और उसमें हुआ परिवर्तन भी।
  • को बेचने के बाद बाजार मूल्य तथा उसमें हुआ परिवर्तन को भी देखा जाता है।
  • किसानों द्वारा उसकी बेची गई वस्तु या उत्पाद या फिर उसके द्वारा खरीदी गई वस्तु का मूल्य और उस पर हुआ परिवर्तन।
  • मांग संबंधित जानकारीइस पर सरकार प्रति व्यक्ति खपत और प्रसंस्करण उद्योग की कुल कीमत तथा रुझान और क्षमता यह सब देखती है।
  • अपूर्ति संबंधित जानकारी-सरकार क्षेत्र देखती है, उपज कितनी है और उत्पादन इसके साथ-साथ आयात निर्यात और घरेलू उपलब्धता अर्थात कितनी खपत है और सरकार या फिर सरकार द्वारा बनाई गई एजेंसियों या उद्योगों के पास कितना स्टाकहै।
  • इस सबके अलावा विदेश अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनाज की कीमत और उस में होने वाले बदलाव तथा इन उत्पादकों का विश्व बाजार में मांग और आपूर्ति की स्थिति यह भी शामिल है।
  • किसानों द्वारा उत्पादों केरखरखाव तथा प्रसंस्करण में लगी लागत और उस मैं होने वाला बदलाव।
  • खाद्य तेल गुड जूट के सामान चीनी सूती धागे जैसे कृषि उत्पादों में डेरिवेटिव होता है  इन्हें उपयोग युक्त  बनाया जाता है अर्थात डेरिवेटिव की कीमत और उसमें होने वाला परिवर्तन।
  • भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण , कर/शुल्क विवरण सेवाएं और बाजार पदाधिकारियों द्वारा बनाए और रखा गया मार्जिन जो मंडी में सुनिश्चित किया जाता है।
  • तथा कीमत का सामान्य स्तर और उसमें होने वाला बदलाव को भी परखा जाता है।

इस नीति को गन्ने के लिए मूल्य निर्धारण किया गया है

1955 में जारी हुआ एक गन्ना आदेश 1966 के प्रावधानों द्वारा नियंत्रित होता है 2009-10 सन के लगभग चीनी मौसम से पहले सरकार एसएमपी वैधानिक न्यूनतम मूल्य तय कर रही थी और इस मूल से जो भी लाभ/मुनाफा होता है उसे गन्ना और किसान 50:50 के आधार पर एक चीनी मिल के मुनाफा को साझा करने का हकदार थे चौकी उस समय देखा जाए तो मुनाफा का यह बंटवारा लागू नहीं हुआ था

फिर 1966 के आदेश को 2009 में संशोधित किया गया और इस पर एमएसपी की अवधारणा को गन्ने के उचित मूल्य आरती से बदल दिया गया था तथा एफआरपी की गणना के लिए एक नया खंड जोखिम बनाया गया और मुनाफे के कारण गन्ने के उत्पादकों के लिए उचित और सही मार्जिन को डाला गया था और इस मार्जिन को तय करने में काफी चीजों को ध्यान में रखा गया था आयोग इस सब को देखते हुए ही एक मार्जिन सुनिश्चित की उसमें से कुछ कारक निम्न प्रकार से है।

  • गन्ने की खेती करने में लगने वाली लागत।
  • कृषि वस्तुओं की कीमतों की सामान्य प्रवृत्ति तथा वैकल्पिक फसलों से उत्पादक की वापसी।
  • सभी उपभोक्ताओं को उचित एवं सही मूल्य पर चीनी की उपलब्धता करना।
  • गन्ने से चीनी बनाने में लगी लागत अर्थात रिकवरी दर।
  • असल में चीनी की मार्केट वैल्यू या कीमत।
  • उप उत्पाद जैसे उत्पादन से बना उत्पाद से कोई अन्य सामग्री का बनाना उत्पाद की बिक्री से होने वाली प्राप्ति अर्थात गुड कोई और प्रेम मिट्टी या उनका आरोपित मूल्य।
  • गन्ने के उत्पादकों के लिए जोखिम और मुनाफे के कारण उचित मार्जिन इससे भी सरकार द्वारा तय किया जाता है और इसे पहली बार अक्टूबर 2009 में डाला गया था।

MSP (Minimum Support Price) का महत्व

जैसे की हम सभी जानते हैं वैश्वीकरण के कारण या परिणाम स्वरुप कृषि वस्तुओं का मुफ्त व्यापार हुआ है किसान की सहायता करना तथा रक्षा करना समय की आवश्यकता है।

  • एमएसपी किसानों की फसलों को कीमतों के उतार-चढ़ाव तथा कालाबाजारी जैसे खामियों से बचाता है।
  • तथा यह आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाने को प्रसारित के साथ-साथ फसलों और सुनिश्चित बाजारों के लिए गारंटी कृत करता है।

CSP,MSP को कैसे निर्धारित करता है.?

जैसे कि CACP तय करती है कि किसी भी उत्पादक में कितना एमएसपी तय करना है ठीक वैसे ही कृषि लागत और मूल्य आयोग सीएसीपी जो स्वामीनाथन समिति के द्वारा दिया गया फार्मूला है उसी के आधार पर एमएसपी निर्धारित करता है तथा किसानों के सामने आने वाली कठिनाइयां तथा मुद्दों को संबोधित करता है तथा इससे संबोधित करने के लिए भारत सरकार द्वारा गठित एक पैनल है

  1.   A2 – A2 का मतलब यह है कि किसानों द्वारा जो भी खर्च हुआ है जैसे कि बीज ,उर्वरक,रसायन, किराए के श्रम आदि जैसे सभी खर्चों को कवर करता है।
  2.   C2 – इसमें देखा जाए तो यह स्वामित्व वाली भूमि और पूंजीगत धन पर छोड़े गए राजस्व के अलावा A2+FL को कवर करता है।
  3.   A2+FL – इसमें खेती में लगी वास्तविक लागत और अवैधानिक अर्थात पूरे परिवार द्वारा की गई मेहनत जिसमें वह खेती तैयार हुई है यह निर्दिष्ट मूल शामिल रहते हैं।

एमएसपी (MSP) का लाभ.

हाल ही में आप सभी ने सुना होगा कि पंजाब के और हरियाणा के किसान ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं दिल्ली में जाकर अन्य राज्य के किसान कम मात्रा में थे सिर्फ इस लाइन से साबित होता है कि एमएसपी का संपूर्ण फायदा हरियाणा और पंजाब के किसान को ही मिल रहा है इसकी वजह सिर्फ यही है कि इन दोनों राज्यों के खुशहाली के अतीत में एमएसपी का बड़ा हाथ रहा है और है भी,

देखा जाए तो यह भी एक तर्क की बात है देश के कुल 5 फ़ीसदी किसानों को एमएसपी का फायदा मिलता है इसका कारण भी है क्योंकि इस व्यवस्था नीति की शुरुआत पंजाब और हरियाणा में गेहूं और चावल की पैदावार को बढ़ावा देने के मकसद से शुरू हुई थी और उस समय जब 1980 में के दशक में हरित क्रांति का इतिहास रचा गया था तब ही से 5% किसान इससे जुड़े हुए हैं और दूसरी तरफ 95 फ़ीसदी किसान वह है जो कि इस सिस्टम से अनजान है उन्हें इसकी कोई जानकारी ही नहीं है इसके पीछे जागरूकता की कमी एमएसपी मंडी को लेकर अरुचि और खेतों का अपर्याप्त आकार होना रहा है.।

सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP)

वस्तुविविधतारुपये प्रति क्विंटल
खरीफ फसलें
धान का खेतसामान्य1940
ग्रेड ए’1960
ज्वारहाइब्रिड2738
मालदंडी2758
बाजरे2250
मक्का1870
रागी3377
तूर (अरहर)6300
मूंग7275
उड़द6300
कपासमध्यम स्टेपल5728
लांग स्टेपल6025
मूंगफली5550
सूरजमुखी के बीज6015
सोया बीनकाला
पीला3950
तिल7307
नाइजरसीड6930
 
अन्य फसलें
खोपरापिसाई10335
(कलेंडर वर्ष)गेंद10600
छिलके रहित नारियल (कैलेंडर वर्ष)2800
जूट4500

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